महान भारत की गंदी तस्वीर। (चिंतन)

मेरा भारत महान है और इसकी महानता का कसीदा पढने के लिये तमाम ऐसी उपलब्धियाँ है जो महान भारत की काल्पनिक तस्वीर पर रंग उभारने का काम करती है पर क्या उन तमाम उपलब्धियों के अलावा और भी महत्वपूर्ण बिन्दु है जो महान भारत की सीमा-रेखा तय करते है?

अब मुख्य विषय यह है क्या हमारी महानता इतनी ज्यादा हो गयी है कि हम छोटी किन्तु धरातल से जुडी बातें नही करना चाहते और उन बातों  की संवेदना से हमारा ह्रदय द्रवित नही होता है । 

आखिर क्या बात है कि बडे़ शहरो की बड़ी-बड़ी इमारतो की छाँव मे झोपड़ियाँ पलती है, अनेक प्रकार की प्रमुख जिम्मेदारियों से जुडे़ लोगो को सडको के किनारे चूल्हा जलाते लोगों कि दिक्कते नही दिखती और सबसे बड़ी बात यह है कि भीख मागते बच्चे हर चौराहे को अपना घर बना चुके है। वो बच्चे भीख मागने के समय कभी-कभी दुर्घटना के शिकार भी हो जाते है जिसके बाद की स्थिति क्या होती होगी ये हम नही जानते क्योकि हमारी संवेदना की द्रष्टि को निकट द्रष्टिदोष हो गया है और भौतिक सुखो की अधिकता के लिये स्वार्थ की जकड़न और भी मजबूत होती जा रही है।

शिक्षा ,गरीबी,भुखमरी,साफ-सफाई और सामाजिक तथा मानवीय कई ऐसे सवालात है जिस मुद्दे की अगुवाई,स्वघोषित लोकप्रिय नेताओ द्वारा हर छोटे-बडे़ चुनाओ मे किया जाया है पर इस मुहिम का दुल्हा कोई नही बनना चाहता जो इन सामाजिक एवं मानवहित कार्यो की रश्म निभाये। 

फिर भी हर कोई महान भारत का झण्डा लिये खडा है जो या तो किसी स्‍वार्थ में खडा या तो बहुमुखी सोच में असफल व्यक्ति या भोला , जिसके माथे बेवजह पर संतुष्टि की चमक स्फुट्टित हो रही है।
शशिकान्त दुबे।

​शिक्षा का सामाजिक चेतना

शिक्षा के महत्वता को किसी भी सूरत मे अस्वीकार नही किया जा सकता परन्तु इसके महत्वो की सामाजिक और मानवीय चेतना को समझना अति आवश्यक है।
हम इस बात से अनभिज्ञ नही है कि इस महान हिन्दुस्तान की लगभग एक चौथाई हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी का है और इस गरीबी रेखा से जरा सा ऊपर या उससे भी थोडा  और ऊपर  वाला व्यक्ति इस बात को भली भाँति परिचित है कि उसका परिवार इस महंगाई के बाजार से निकलकर,पूरे परिवार का तन ढकते हुये कैसे अच्छी शिक्षा के दर्शन मात्र प्राप्ति होती है तो सोचने का विषय यह है कि उन तथाकथित गरीबों का परिवार उपरोक्त विषयों के बारे मे कितना अवगत है उत्तर हम सबका ह्रदय जानता है जब हम उनके ५ वर्ष तक के बच्चो को सडकों के किनारे रोते और ५ वर्ष से ज्यादा उम्र के बच्चो को कबाडी बिनते देखते है उस परिवार की महिलाओ को भी किसी दूधमुहें बच्चे को तन से चिपकाकर उस तपती धूप में ठेला खीचते देखते है जिस धूप मे कार से निकले पौष्टिक आहार लेने वाले को शाम तक जुकाम हो जाती है इस स्थिति मे शिक्षा के महत्व पर चर्चा आवश्यक लगता है क्या इन रईस शिक्षित लोगो को ७ वें वेतन आयोग द्वारा मनमुताबिक बढोत्तरी की माँग करते समय देश के करोड़ों शिक्षित कर्मचारियों मे से किसी को वह गरीब एक-चौथाई जनता नही दिखती, संसद मे हंगामा काटकर लाखो का वेतन और सुविधा उठाने वालो को खुद के वेतन बढाने की माँग करते वक्त जरा भी हिचक नही आती तो मुझे लगता है सियासत ने असंवेदना की चादर ओढ ली है और कुछ ऐसे ही गंध मे सनी जाल समाज मे फेंककर शिक्षित और सम्पन्न लोगो में असंवेदना और भेदभाव का जन्म दिया जा रहा है।

यह ध्यान देने का विषय है कि शिक्षित वर्ग के सरकारी कर्मचारी की पगार पचास हजार से बढाकर सत्तर हजार करना जरुरी है या उस बढाये जाने वाले धन से कई गरीबों के जीवन मे सामान्यता लाने की आवश्यकता है।

लगातार बढती हुई जनसंख्या की वजह से यह खाई और बढती जा रही है जिससे समाज के एक बडे हिस्सा पर मानसिक दबाव बन रहा है कि वह अपनी नैतिकता को बरकरार रखे या उससे समझौता कर घृणित कार्यो को अंजाम दे और ऐसे विषय मे उसकी अशिक्षा उत्प्रेरक का काम करती है और अंजाम समाज मे पनपती हुई नयी तरह की घटनाएँ है।

कुल मिलाकर हम कह सकते है कि पहले शिक्षा का समान मौके ना प्रदान करके असामाजिक और अमानवीय क्ृत करके पीड़ितों को घृणित कार्य की ओर धकेलना और उसके बावजूद भी उनकी हालत पर मौन होना, समाज मे शिक्षा,  शिक्षित लोगो एवं सार्वजनिक जीवन मे तथाकथित लोगो द्वारा किया गया धोखा है जिससे मानवीयता तार- तार हो रही है और समाज मे एक ऐसा माहौल बन गया है जिससे लायक व्यक्ति खुद को शक के नजर से देखता है तो गरीब इस जीवन को भूत के कर्मो का परिणाम समझता है परन्तु यह तो काले बादल  है जो तीव्र गति से अपनी आवेश मे बढे जा रही है पर ध्यान रहे जिस दिन यह किसी विराट पहाड़ से टकरायेगा, काले बादलो की अवस्था और रंग दोनो परिवर्तित हो जायेंगे और अभिमानो की बादल बूंदरुपी प्रेम मे बदलकर सूखे पौधों को फिर हरा करेंगे।

शशिकान्त दुबे।

भारत की राजनिति का आधार

भारत दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र है जिसकी व्यवस्था अन्य देशो की व्यवस्था की भाति ही चल रही है परन्तु अगर हम भारतीय राजनिति के वर्तमान आधार को देखे तो साफ है कि इसका मुख्य आधार धर्म है क्योकि धर्म एक सामान्य जनजीवन से जुडी भावना है जिसे भड़काना बहुत आसान है परन्तु  भारत मे सैकड़ों सालों से साथ रहने वाले हर हिन्दू -मुस्लिम को समझना होगा कि ये स्वार्थ सिद्ध का आह्वान लिये कुछ चन्द राजनीतिक लोग है जो धर्म मुद्दे से निकलने वाले रस का रसपान कर अपना राजनीतिक प्यास बुझाते है और हम इनके बहकावे मे आकर, धर्म के नाम पर जज्बात दिखाकर अापसे मे भिड जाते हैं और मानवता की भी हदे पार कर जाते है । कुछ बातें जरुर है जो धर्म के नाम पर शुरु किया गया आतंकवाद जिसकी आंच हमारे समाज मे पडी है पर अगर हम भी इस समाज मे धर्म के नाम पर अपने ही साथ रहने वाले लोगों के साथ भेदभाव करेंगे तो आतंकियो मे और हममे क्या फर्क रह जायेगा बस हम आतंकी कहलायेंगे नही ।

पर हमें गलत काम इसलिये करे ताकि कोई हमें गलत नही कह रहा और मानवता की अस्मिता तो लाघें  तो ये सोचना ठीक नही होगा क्योंकि धर्म का मुख्यमंत्री परमात्मा सबकुछ देख रहा है ।

शशिकान्त दुबे।