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मोदी का बवासीरी पीड़ा ।

150 से ज्यादा बच्चों के मौत के बाद भी देश का प्रधानमंत्री ना पीड़ित परिवारों से मिलने जाता है ना ही सान्तवना में एक संदेश लिखता है। मंत्री जरूर पहुचते है लेकिन बच्चों की हालत समझने से ज्यादा उन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच पर दिमाग रहता है ।

2014 में भाजपा की सरकार बनने के बाद 100 स्मार्ट सिटी की घोषणा में बिहार के मुजफ्फरपुर का भी नाम शामिल है लेकिन वहां के सरकारी अस्पताल में दवा और सुविधाओं की कमी है जिससे बच्चों की लगातार मौत हो रही है लेकिन मोदी फिर भी इस मामले पर चुप रहते हैं । और जब मामला हद से ज्यादा खराब होने के बाद, मरने वाले बच्चों की चिता की राख ठंडी हो जायेगी तो किसी राजनीतिक माहौल मे,स्वार्थ सिद्धी का आह्वान लिए यही व्यक्ति बवासीरी मुँह से कहेगा *भाईयो – बहनों मुझे बहुत पीड़ा थी।* सच में इतनी पीड़ा है तो कुछ बोलते क्यो नही, सिर्फ़ क्रिकेट नें शिखर धवन की उंगली की चोट पर पीड़ित होते हो।
फिर एक दिन उन भक्तों को भी जबड़ा फैलाने कि मौका मिल जायेगा जो आज कन्फ्यूज है कि मोदी समर्थन नें बिहार के बच्चों के मौत पर कुछ बोलना भी चाहिए या नही।

शशिकांत दुबे ।

Shashikantdubey96@gmail.com

राजनीतिक विचारधारा का टेस्ट ।

कभी आपने स्वयं को समय देख कर यह जानने की कोशिश की है कि जब किसी विशेष बिंदु पर जो विचार आपके मन में चल रहा है, या आप जो करने की कोशिश कर रहें हैं, वह आपके स्वयं के विचार की उत्पत्ति है या किसी का सुझाव है? या दोनों का समानुपातिक या असमानुपातिक मिश्रण?

मुझे पता है आप में से ज्यादातर क्या सोच रहे हैं। तो आइए स्वयं का एक टेस्ट करते हैं । राजनीतिक विचारधारा का टेस्ट ।

देश में राजनीति की गहमागहमी है और नई सरकार का गठन भी हो गया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में एनडीए की एक बार फिर सरकार बनी है । 30 मई 2019 को शपथ ग्रहण समारोह भी संपन्न हो गया, मंत्रिमंडल का भी बंटवारा भी हो गया है और कह सकते है कि सरकार बनने से पहले और बाद तक की लगभग सारी औपचारिकताएं पूरी हो गई है। कुछ कार्यकर्ताओं और समर्थकों का भी खून धीरे-धीरे ठंडा होने लगा है जो चुनाव प्रचार के दौरान उबल रहा था तो कुछ समर्थकों का खून अब कुछ ज्यादा ही उबलने रहा है, जिसका उदाहरण है 23 मई के चुनाव नतीजे आने के बाद देश में होने वाली तमाम घटनाएं । पिछले दिनों देशभर में धुआंधार प्रचार हुए भाजपा, कांग्रेस,सपा,बसपा,जदयू,राजद और अन्य दलो ने भी इस तथाकथित राजनीतिक महापर्व में भाग लिया । प्रधानमंत्री समेत सभी दलों के छोटे-बडे नेताओं ने असभ्य भाषा और शब्दों का प्रयोग करने में कोई कोताही नहीं बरती , पर हमनें उसमें भी सहमति और असहमति का आड़ लेकर किसी न किसी का पक्ष लिया । देशभर में उम्मीदवारों के टिकट वितरण की बात हो या वोट मांगने की तरीकों की लगभग सभी पार्टियों ने जातिगत और धार्मिक कार्ड खेलें लेकिन फिर हमने,अपने और गैरों का भेदभाव करके किसी ना किसी राजनीतिक दल का पक्ष लिया ।

स्पष्टतः कह सकते हैं कि लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन करने वाली जिन सारे औजारों का प्रयोग राजनीतिक दल कर सकते थे, उन्होंने पूर्णता किया।कुछ जगहों पर राजनीतिक गंदगी की हदें पार की गईं। चुनाव के इतिहास में बंगाल में पहली बार धारा 324 का लागू करना और समय से पूर्व चुनाव प्रचार बंद करने की घोषणा इसका मुख्य उदाहरण है। फिर भी हमने किसी न किसी राजनीतिक दल का पक्ष लिया उनके विचारों से अपने विचारों को मिलाया और उस विचारधारा को अपने परिवार, दोस्तों,संबंधी और समाज में फैलाने का काम किया ।कभी किसी विचारधारा को अपना समझा तो कभी किसी उम्मीदवार को अपने जाति का , कभी किसी एक मुद्दे को सर्वोपरि समझा तो कभी एक बहस की जीत को अंतिम निर्णय और लगातार विचारों को दूसरे के ऊपर थोपने की कोशिश की । तो आप कैसे विश्वास कर सकते हैं कि आपने एक मजबूत लोकतंत्र में मजबूत समर्थन देने का काम किया। किसी नुक्कड़,चौराहे,सभा और टीवी में किसी एक मुद्दे पर हो रही बस में जब तक सारे विचारों को नहीं सुना और विचार करने के बाद नही बोला तो आपको कैसे लगता है कि आपकी भाषा किसी दूसरे की विचार की गुलामी नहीं कर रही है, और जब आप की भाषा ही गुलाम है,आपकी सोच और विचार ही गुलाम है, आप कैसे स्वतंत्र है और कैसे उम्मीद करते हैं कि आप स्वयं मन के स्वतंत्र विचार और किसी के सुझाव की समानुपातिक गणित से किसी भी एक उचित निर्णय पर पहुंचेंगे ।सरकार और राजनीति के तरीकों से तमाम दलों द्वारा कुछ उचित या अनुचित काम करने पर तत्काल रुप से बहुत अच्छे या बुरे होने का निर्णय पर ना पहुंचे क्योंकि 5 साल की सरकार और राजनीति किसी कंपनी का एक स्टॉक नहीं जिसके बढ़ने से सरकार या राजनीतिक दल अच्छे और कम होने से खराब हो जाते हैं राजनीति म्यूच्यूअल फंड्स, बीएसई (BSE= Bombay stock exchange) और एनएसई (NSE= National stock exchange) के बढ़ते घटते अंक जैसे हैं, जिसके बढ़ने से बाजार को अप तथा घटने पर बाजार डाउन की स्थिति में माना जाती है अतः सभी मुद्दों और विचारों को अपने दिमाग में रखकर किसी निर्णय पर पहुंचे ।
शशिकांत दुबे ।

माँ ,(एक संपूर्ण दुनिया) ।

मेरा छोटा सा परिवार है जिसमें मां,पिताजी,बड़े भाई और एक छोटी बहन है और मेरे घर का हर एक काम मेरी मां की जानकारी में होता है। बचपन में जब हम लोग मां की किसी बात से सहमत नहीं होते थे और किसी बात पर जिद करते थे तो मां हमें पीटती थी, तब लगता था कि मां नफरत करती है, लगता था कि हम लोगों की बात ना मान कर हम लोगों के साथ ज्यादती कर रही है और हम अपने दिमाग में तरह-तरह की बातें सोचते थे। माँ का हम लोगों के प्रति दिया जाने वाला ध्यान बंदिशे लगती थी तब मन में सिर्फ एक बात आती थी कि कितनी जल्दी हम इन बंदिशों से दूर हो जाते हैं।

अब वक्त काफी गुजर गया है, हम घर से बाहर हैं। दिन भर अपने अलग-अलग कामों में लगे रहते हैं और अपनी एक नई दुनिया भी बना लिया हैं जो दुनिया मां के उस बंदिशों और अन्य पुराने माहौल से बहुत अलग है किन्तु आज भी जब हम किसी दुख में होते हैं या बाहरी नवगठित दुनिया में बहुत प्यार और सम्मान नहीं मिलता है या जब कभी हम बीमार होते हैं या किसी बात की उलझन में और उदास होते हैं तो माँ तुम्हारी बहुत याद आती है तब लगता है कि दुनिया में सिर्फ तुम ही हो जिसके पास मैं जाऊं तो अच्छा महसूस होगा सिर्फ तुम ही हो जो मेरे हर सुख में साथी तो नहीं, पर हर एक दुख में तुम्हारी बहुत याद आती है क्योंकि कोई और हमारी दुखों का असली अंदाजा भी नहीं लगा पाता, किसी और की सांत्वना मेरे दुख के गहराइयों तक ना पहुंच पाती है ना दुख भरने के काम आती है तब आंखों में भरे आंसू का हर एक बूंद तुम्हारे उस प्यार और स्नेह के लिए निकलता है जो तुमने अपने जीवन भर दिया है तुम्हारा प्रेम और गुस्सा दोनों मेरे हित के लिए था जो आज समझ आता है।हर व्यक्ति की तरह मैं भी कृतज्ञ हूं इस पावन रिश्ते को अहसास करके और तुम्हारे चरणों में मैं अपना शीश झुकाता हूं आज भी मेरी हर परिस्थितियों में साथ देने के लिए और मेरी सलामती की दिल से दुआ करने के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद मां। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं और हमेशा करूंगा । तुमने मेरे लिए जो कुछ भी किया वह हर एक सीमा से बाहर है। मैं उस सीमा तक जाकर तुम्हे प्यार तो नहीं दे सकता पर कोशिश करूंगा आप की सेवा करके उसका कुछ अंश चुका पाऊं।

तुम्हारा बेटा

शशि कांत दुबे।

गलत सवर्ण आरक्षण ( i hate this reservation)

मोदी सरकार द्वारा सवर्णों को दिए गए आरक्षण पर सवाल-जवाब और पक्ष- विपक्ष की बातें शुरू हो गई हैं! परंतु मै जानना चाहता हूं कि क्या सच में मोदी सरकार को गरीब सवर्णों की चिंता है या यह एक चुनावी जुमला है जो मोदी सरकार ने 2014 में काले धन को लेकर दिए थे ?

सामान्य जाति के लोगों में काफी खुशी और उत्साह का माहौल है परन्तु मैं इस बात से सहमत नहीं हूं क्योंकि मोदी सरकार का यह स्टंट इसलिए नहीं भा रहा क्योंकि यह चुनाव के वक्त दिया गया एक लॉलीपॉप है , अगर मोदी सरकार को इतनी ही गरीब सवर्णों की चिंता थी तो 4 वर्षों से कहां थे या कथित दलित एक्ट पर इन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को क्यों पलट दिया था जबकि इस एक्ट के कारण सबसे ज्यादा परेशान गरीब सवर्ण होते हैं ना कि अमीर। और सच में अगर उन्हें गरीबों की ही चिंता है तो पूर्व से ही प्रदान की जाने वाली अलग आरक्षण वर्गो में गरीबों के बारे में क्यों नहीं विचार करते हैं। मेरे असहमत होने का दूसरा कारण क्या है जिस सवर्ण जाति ने इस आरक्षण की दंश सदियों तक झेली है ,क्या उसे भी आरक्षण स्वीकार चाहिए । मेरे हिसाब से चुनावी समय में दिया गया यह आरक्षण नही सिर्फ अपमान है।

इसलिए हम सभी को मिलकर इस 10% के आरक्षण का विरोध करना चाहिए और हमें सोचना चाहिए कि क्या सिर्फ दलितों के को दिए जाने वाले आरक्षण की वजह से ही हमारे देश के प्रतिभावान छात्रों के साथ अन्याय होता था या इस आरक्षण की वजह से भी वैसे ही सपनों का हनन होगा। और इसकी चिंता अगर सच में इस मोदी सरकार को है तो सबसे पहले इनको नौकरियों की संख्या में बढ़ोतरी करनी चाहिए क्योंकि पिछले 4 वर्षों में से कम नौकरियां इस सरकार ने दिया है।
जय हिंद जय भारत।
शशिकांत दुबे।

shashikantdubey96@gmail.com

राजकीय पालीटेक्निक और दीवाली.(HAPPY DEEPAWALI)

राजकीय पालीटेक्निक, लखनऊ और दीवाली से सम्बन्ध स्थापित करने को कहा जाये तो जरा सोचिये और बताइए कि आपके दिमाग मे कौन-कौन सी बातें आयेंगी?।
दीवाली से पहले और बाद की कुछ क्षण तो याद आयेंगे, पर ठीक दीवाली के दिन राजकीय पालीटेक्निक से सम्बन्धित कोई वाकया नही याद आयेगा, कारण है कि आप उस समय घर मे अपने परिवारजनों के साथ खुशियाँ मना रहे होते हो परन्तु आपकी चहलकदमी से सदैव आनन्दित होने वाला यह परिसर इस दिन थोड़ा अकेला महसूस करता है और पूरे परिसर मे सनसनाहट की आवाज सुनाई देती है और इस सनसनाहट को वो छात्र महसूस कर पाते है जो दीवाली के अगले ही घर से वापस आ जाते है तो पूरे परिसर मे झाड़ू वाले के अलावा कुछ और कर्मचारी दिखते है जिन्हे आप देखते तो पूरे साल भर है परन्तु उसी वक्त उनसे बात कर पाते है और मनुष्यता के पटल पर आकर कुछ बातें साझा करते है।

ये अनुभव, एक चलचित्र की भाँति जीवन भर आपकी आँखों के सामने नाचते रहेंगे परन्तु ये अनुभव आपको सिर्फ इस परिसर के साथ जीने में ही प्राप्त होती है और भी तमाम अनुभव और यादें होती है जो जिन्दगी के किसी ना किसी मोड़ पर राजकीय पालीटेक्निक लखनऊ की याद दिलाती है। तो जीवन के इस अनोखे यादों के मोड़ से ऐसे गुजरो कि हरेक मोड़ पर GPL याद आये।
आपको और आपके परिवार को दीवाली की ढेर सारी बधाईयाँ।

शशिकांत दुबे।
shashikantdubey96@gmail.com

महान आत्मा को अंतिम प्रणाम (त्रिपाठी सर)।

क्लासरूम से बाहर, खासकर खेल के मैदान मे जब भी वो मिलते थे, एक अलग ही रिश्ता होता था। 50+ वर्ष की उम्र के बावजूद भी हम युवाओं के मित्र जैसा व्यवहार उन्हे अन्य अध्यापकों से भिन्न करता था।

एक अध्यापक, वार्डन,खेल शिक्षक और एक अच्छे मित्र जो भी कहा जाय पर वो तीन वर्ष के दौरान हर तरीके से किसी ना किसी रूप में राजकीय पालिटेक्निक के हर छात्र से सम्बन्धित रहते थे और शायद इससे बडी़ बात कुछ नही हो सकती। सार्वजनिक रूप से सबके हित की बात सोचने के अलावा वो बहुत छात्रो के निकट एवं करीबी हितैषी भी रहे है। आटोमोबाइल के सबसे अच्छे शिक्षक के साथ- साथ हर क्षेत्र मे त्रिपाठी सर का योगदान,राजकीय पालिटेक्निक , लखनऊ के लिये विशेष महत्व रखता है जिसको भुलाया नही जा सकता है।ऐसे महान शिक्षक, छात्रमित्र एवं सबके हित मे सोचने वाले त्रिपाठी सर का इस दुनिया से असामयिक अलविदा कहना हम सब सबको चकित कर दिया। अन्ततः मै आपको अंतिम प्रणाम करता हूँ भगवान इस महान पुण्य आत्मा को शान्ति प्रदान करें और उनके परिवार को इस मुश्किल क्षण से बाहर निकलने की शक्ति प्रदान करें ।

शशिकांत दुबे (जिसे हास्टल में आपने थप्पड़ मारा था आशीष समझकर हमेशा याद रखूंगा)

गली-गली में शोर हेै- माखनचोर।

घर से बाहर, गायों के पीछे-पीछे दिन भर बाहर रहने में तुम्हे बहुत मजा आता। कदम्ब के पेड़ों पर बैठ बांसुरी बजाते कान्हा जब अपने धुन मे खो गये तो गायें भी उस पेड़ के नीचे आकर चारों तरफ से घेरकर बांसुरी के धुन का आनन्द प्राप्त करने लगी, आसपास सुकून की मध्यम हवा का प्रवाह होने लगा और सारी गायें विश्रामावस्था में हो गयी फिर कान्हा स्वयं भी गायों के मध्य विश्राम करने लगे।

शाम को गायों के साथ वापस आये तो उन्हे देखकर नन्द बाबा की चेहरे पर चमक आ गयी। बाल कान्हा के घर पहुँचने का आहट मिलते ही गोपियां ढेरों शिकायतों के साथ माता यशोदा के पास पहुच गयीं और कान्हा की मटकी फोडने, कपड़े चुराने और मक्खन चुराने जैसी शिकायतों से घेरा तो माता ने कान्हा को गोपियों के मध्य खड़ा कर सच पूछा।कान्हा थोड़े देर सहमे तो यशोदा माई ने कान पकड पुनः पूछा क्या तुमने ऐसा किया?

फिर तुतलाते हुये बोला- “माता मै तो सुबह से गायों के साथ था भला मै माखनचोरी कैसे कर सकता और इनके कपड़े मै क्यों चुराऊँगा?” माता नटखट कन्हैया की बातें ध्यान से सुन रही थी और फिर कन्हैया ने अपनी बातों का पुल बाधना शुरू रखा कभी वो सिर हिलाते, तो कभी नन्हे हाथों से समझाते! कभी आखों तो कभी चेहरे के भाव से ऐसे काम ना करने के कई कारण बताये। बाल-कान्हा तुतलाते बातों रस-सागर में माता यशोदा संग सारी गोपियां डूब गयीं कि बाल-गोपाल कन्हैया ने मौका पाकर यशोदा माई से हाथ छूटाकर दूर निकल लिये। अचानक माता सहित गोपियों को होश आया कि कान्हा तो भाग निकला पर फिर भी सबके मुख पर खुशी और आँखों में कान्हा के चंचलता की चमक थी।

गोपियाँ भी कान्ह‍ा के ऐसे ही प्रेम की आकांक्षा रखते हुये अपने घरों मे स्वादिष्ट माखन रखती कि कन्हैया इसी बहाने उनके पास आये अपनी बातों के स्पर्श से उन्हें आनन्दित करें।
अगर कान्हा एक मटके माखन के साथ अगर हमारे जीवन के सारे दुख को चुरा लेते है तो भला इसके सस्ती कीमत क्या हो सकती है।
अतः प्रेम और भाव के इस सागर को मेरा प्रणिपाद स्वीकार हो।

शशिकांत दुबे।